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उत्तराखंड का ड्रोन एप्लीकेशन सेंटर बहुत अहम, आगे के लिए हैं कई योजनाएं तैयार

Jan 8, 2022

अनिल धस्माना, प्रमुख एनटीआरओ

नेशनल टेक्नीकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ) ने भारत का सबसे पहला ड्रोन एप्पलीकेशन रिसर्च सेंटर उत्तराखंड में देहरादून में बनाया है। उसका कारण यही था कि एनटीआरओ का सबसे बड़ा बेस देहरादून एयरपोर्ट पर है। यह बात बहुत कम लोगों को पता है। ‘नीड टू नो बेसिस’ पर वहां काम होता है।

जब उत्तराखंड की विशेष परिस्थितियां और टोपोग्राफी को देखा गया तो चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि हमारे पास ऑलरेडी एक एस्टेब्लिशड सेंटर है। अगर किसी स्टेट में ड्रोन का कोई रिसर्च सेंटर बनाना है तो हमें उत्तराखंड से कार्य शुरू करना होगा। इसके बाद यह कार्य हमने 2018 में यहां शुरू किया।

मुझे यह बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि इस सेंटर के बनने के बाद हमने करीबन तीन पायलट बेसिक कोर्सेज यहां किए। इसी सेंटर में एनटीआरओ के सामूहिक प्रयासों के बाद डीजीसीए ने पहला ट्रेनिंग पायलेट कोर्स किया। वो भी यहीं देहरादून में हुआ था। जिन लोगों ने उस ट्रेनिंग कोर्स को यहां से किया, वे आज ड्रोन ट्रेनिंग कोर्स के डीसीए एप्रूव्ड इंस्ट्रक्टर हैं। इसलिए उत्तराखंड का ड्रोन सेंटर बहुत महत्वपूर्ण है।

इस ड्रोन रिसर्च सेंटर के शुरू होने के बाद उत्तराखंड में कई जगह जब आपदाएं आईं तो यहां के अधिकारियों ने ड्रोन्स का पूरा उपयोग किया। ड्रोन्स को थोड़ा मॉडिफाई करके उन आपदाओं के दौरान इस्तेमाल किया गया। यह तो एक छोटा सा प्रयास था, आगे बड़े-बड़े प्लान हैं।

आपको पता है कि उत्तराखंड बॉर्डर स्टेट है। तिब्बत ऑटोनॉमस रीजन से लगा हुआ है। एक तरफ नेपाल का भी बॉर्डर है। ड्रोन का सिस्टेमैटिक एफर्ट करके उपयोग करना चाहें तो बॉर्डर पुलिस के लिए यह बहुत उपयोगी साधन होगा।

हमारा उत्तराखंड इतना फैला हुआ है कि कई सीमांत इलाकों में मीलों तक कोई गांव नहीं हैं। वहां बॉर्डर्स में जो पेट्रोलिंग होनी चाहिए, क्योंकि बहुत रिमोट एरिया होता है, इसलिए कम होती है या सही ढंग से नहीं होती है। इस चीज के लिए ड्रोन बहुत ही ज्यादा उपयोगी साबित होगा, क्योंकि ड्रोन से आप रिमोट के जरिये भी बॉर्डर का सर्विलांस कर सकते हैं। इसके बारे में हमने चर्चा की है।

मुझे उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट पर उत्तराखंड में आगे काम किया जाएगा। ड्रोन के और क्या उपयोग हैं, मुझे उसपर ज्यादा विस्तार से जाने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा एनटीआरओ ने एक कम्युनिकेशन सिस्टम बनाया है जिसका उपयोग भूकंप, तूफान या सुनामी के हालात में किया जा सकता है।

ऐसे समय पर जब आपके पास कोई भी कम्युनिकेशन सिस्टम न हो तो एनटीआरओ ने ऐसा एक मोबाइल सिस्टम डेवलप किया है जिसे आप अपने बैगपैक में भी ले जा सकते हैं। कितना वेट आप ले जाना चाहेंगे उसके हिसाब से उसका डिस्टेंस कवर होता है। यह बहुत ही नॉर्मल सिस्टम है। उसमें बहुत बड़ी कोई मशीनरी की जरूरत नहीं है। जो कॉमन मोबाइल फ़ोन हैं उन्हीं को ट्वीक करके सिस्टम को बनाया गया है।

ऐसे समय जहां आपके पास कोई साधन न हो कम्युनिकेट करने का, उस स्थिति में आप टेम्परेरी दस फुट का टावर इरेक्ट कर सकते हैं। उसे आप गाड़ी,ज़मीन कहीं पर भी लगा सकते हैं। जो स्पेक्ट्रम पहले से उपलब्ध है, उसको अपने लगाए टावर के साथ कनेक्ट कर सकते हैं। इस सिस्टम में हमने टेंपररी बेस टावर बनाकर उन फ्रीक्वेंसीज को यूज़ किया है जो उस स्पेक्ट्रम में एलोटेड नहीं थीं। इससे आप 5 से 7 किलोमीटर के अंदर अपना एक नेटवर्क बना सकते हैं और किसी से भी संपर्क कर सकते हैं।

मेरी उत्तराखंड के कुछ अधिकारियों से इस बारे में चर्चा हुई है कि जल्द इस सिस्टम को उत्तराखंड लाया जाएगा। उत्तराखंड में बहुत ही दूर दराज वाले इलाके हैं वहां इसका कई तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा मैं बताना चाहूंगा कि उत्तराखंड देवभूमि है, यहां ईमानदारी है, मेहनती लोग हैं, संयम है। एजुकेशन लेवल किसी भी स्टेट से कम नहीं है। सब लोग किताबों में पढ़ते हैं और आप कभी गजेट ऑफ इंडिया पढ़ेंगे तो मैक्सिमम क्लास वन ऑफिसर्स उत्तराखंड से हैं। उसका कारण यह है कि हमारे पास ऑप्शन बहुत कम होते हैं।

हम अपनी ईमानदारी, मेहनत, पढ़ाई करके जो भी मौका मिलता है, उसमें आगे बढते हैं। जब हमारे पास सब चीजें उपलब्ध हैं तो हमें सिर्फ इस रैबार को बार-बार हर जगह फैलाना है। तभी लोगों में जागरूकता आएगी। मैं स्वयं एक छोटे से गांव में पैदा हुआ हूं। मैं बॉम्बे में पढ़ता था। एक बार मेरी दादी आई थी तो मैं अचानक उनके साथ गांव गया।

मैं पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला हूं। सतपुली के आगे द्वारीखाल है वहां मेरा गांव है। उस समय वहां कोई लाइट नहीं थी। मैं दादी के साथ घूमने गया था पर मुझे वहां की सहजता और लोगों के व्यवहार में प्यूरिटी दिखी उस समय मैं बहुत छोटा था, मैंने पांचवीं पास की थी। तब मैं सबकुछ छोड़कर तीन साल गांव रहा। तीन साल में मैंने जो भी सीखा मैं आज भी उसको नहीं भूला हूं।

आज उत्तराखंडी सब जगह अच्छे ओहदों पर है। अगर उसके लिए कोई जिम्मेदार है तो स्वयं उत्तराखंडी ही हैं, क्योंकि उन्होंने मेहनत की। नौजवानों से यही गुजारिश है कि देवभूमि में पैदा हुए आप लोगों के पास सबकुछ है। मरना एक बार सबने है इस जिंदगी में, एक बार कुछ करके जाइए कि जनरल बिपिन रावत की तरह सब आपको याद करें।

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