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उत्तराखंड में प्रतिभाओं की कमी नहीं, अवसर बढ़ाने का हो प्रयास

Jan 8, 2022

प्रसून जोशी, कवि, गीतकार, प्रमुख सेंसर बोर्ड

उत्तराखंड में अक्सर हम सुनते थे कि ‘फूल वही सर चढ़ा जो चमन से निकल गया, इज़्जत उसी को मिली जो वतन से निकल गया।’ यह सोच कि जो बाहर निकल गया, अपना नाम जिसने कर लिया। उससे उत्तराखंड, उसकी प्रतिध्वनि यहां सुनाई देती थी। यह जो यथार्थ है, यह जो सत्य है, मुझे लगता है यह बदलने की आवश्यकता है। क्योंकि उत्तराखंड स्वयं में इतना सक्ष्म है कि जब उत्तराखंड विभूतियों को जन्म दे सकता है तो उन्हें मंच भी दे सकता है।

मुझे लगता है कि मंच की तलाश में यहां से प्रतिभाएं निकलती हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में हमेशा लोग मिलते हैं। लेकिन एक बात जो मुख्यमंत्री भलीभांति समझते हैं, वह एक कवि हृदय व्यक्ति हैं, इसलिए उनसे मैं उनसे इस बात को बार-बार कहता हूं। मुझे लगता है कहीं जब ढोल का सुर होता है तो कहीं बांसुरी लुप्त हो जाती है। जो उत्तराखंड की संस्कृति है, यहां के लोग हैं, वे बांसुरी के एक स्वर की तरह हैं वे ढोल का सुर नहीं हैं। उनका व्यवहार, रोजमर्रा की जिंदगी, उनकी भाषा, उनके गीत, उनका पहनावा, उनका भोजन यह सब अपनेआप आप मे बहुत ज्यादा जेंटल हैं।

जब हम विश्व की बात करते हैं, देश की बात करते हैं तो सावधान होने की आवश्यकता है। क्योंकि जब आपको बांसुरी को सुनना होता है तो बांसुरी के लिए एक माहौल की जरूरत होती है। बांसुरी अगर प्रतिद्वंद्विता में आएगी तो शायद लुप्त हो जाएगा। वैसे ही चाहे उत्तराखंड ही या हमारे देश के कई और प्रदेशों की संस्कृतियां हो, जो स्वभावतः, मूल्यतः उनमें एक तरह का जेंटलनेस है, उसी तरह की उनकी मूल प्रकृति है। उस मूल प्रकृति के हिसाब से एक तरह का विकास चाहिए, एक तरह का मंच चाहिए। यह बात मैं अनुभव से कह रहा हूं।

बम्बई में उत्तराखंड के जो कलाकार आते हैं, कई बार मुझसे मिलते हैं। चाहे वो संगीतकार बनने आते हैं, गीत लिखने आते हैं, एक्टिंग करने आते हैं, वे जुझारु होते हैं, लेकिन मैन्युपुलेटिव नहीं होते हैं। बचपन मेरा पहाड़ों में बीता है और पहाड़ में जो लोग रहते हैं, प्रकृति आपको संघर्ष सिखाती है। लेकिन प्रकृति का संघर्ष बड़ा अलग किस्म का होता है।

जैसे एक नदी में जब आप उतरते हैं तो नदी शुरुआत से अंत तक नदी ही रहती है। नदी बीच में आना स्वरूप नहीं बदलती। उदाहरण के तौर पर मैं कहता हूं कि एक बच्चा जिसकी परवरिश शहरों में होती है, उसका एक ऐसा यथार्थ होता है कि वह एक बस में चढ़ रहा है उसने सोचा वहां एक सीट खाली है तो वहां पर एक रुमाल आकर गिरता है और कहता है कि वो सीट मैंने ले ली। यह एक तरह का मैन्युपुलेशन होता है। प्रकृति के साथ संघर्ष आपको टफ बनाता है लेकिन मैन्युपुलैटिव नहीं बनाता। तो हमारे यहां के बच्चे जब संघर्ष करने आते हैं तब उनके अंदर जज़्बा होता है, वे जुझारु होते हैं लेकिन में इतने ज्यादा व्यवहारकुशल नहीं होते हैं।

उनके लिए जो मंच चाहिए, जैसे मैंने कहा बांसुरी के लिए जो माहौल चाहिए वो अलग माहौल चाहिए। इस माहौल को हमें उत्तराखंड में बनाने की तरफ प्रयास करने चाहिए। पुष्कर धामी जी जैसे व्यक्ति जो हृदय से कवि हैं मैं अपेक्षा रखता हूं कि वह मेरी बात को समझ रहे होंगे।

इसके अलावा जब हम पर्यटन या उत्तराखंड में क्या होना चाहिए इसकी बात करते हैं, क्योंकि यह मंच ऐसा है जहां विचार रखने की आवश्यकता है। बहुत आवश्यक है कि हम दो चीजें समझें। एक तो यह है कि हम प्रगति उतनी ही कर पाएंगे जितना हम मुख्यधारा से जुड़ेंगे।

उत्तराखंड में दो चीजें समझनी आवश्यक हैं। एक तो वो मुख्यधारा से जुड़ा रहे। आज आइसोलेटेड डेवलोपमेंट की संभावना नहीं है। किसी ने नहीं सोचा था कि टेक्नोलॉजी की ऐसी क्रांति होगी कि कुछ भी आइलैंड स्टेटस नहीं रह जाएगा, सब कुछ जाकर कहीं मिल जाएगा। और हमसे अच्छा इसे कैसे कोई और समझ सकता है। हम तो अद्वैत को मानते हैं, सब कुछ एक ही है यह मानते हैं।

आज इंटरनेट को आप देखें तो कहीं न कहीं अद्वैत को ही चरितार्थ करता है। कोई भी पीस ऑफ इंफॉर्मेशन आज एक्सक्लूसिव नहीं है, आज सबके पास वो उपलब्ध है। तो इसलिए जरूरी है कि एक तरफ उत्तराखंड मुख्यधारा से जुड़ा रहे, केंद्र से जुड़ा रहे, एक देश विश्व से जुड़ा रहे, तालमेल की आवश्यकता है। लेकिन साथ-साथ बहुत जरूरी है कि हम अपनी एकरूपता को लेकर भी सजग रहें। इसका डर यह होता है कि सबकुछ एक रस हो जाता है और यूनिफॉर्मिटी आ जाती है और डाइवर्सिटी खत्म हो जाती है। तो उत्तराखंड का जो मूल स्वभाव है उसे समझने की जरूरत है। उसके तहत प्रोफेशनल डेवलपमेंट और एम्प्लॉयमेंट उसके साथ-साथ चले। उदाहरण के लिए जब हम फिल्मों की बात करते हैं स्वभावतः हमारे यहां के लोग क्रिएटिव होते हैं।

मैं यह मानता हूं कि उत्तराखंड के लोग कल्पनाशील होते हैं। हमारे गीतों में, हमारे यहां संस्कार गीत होते हैं। मेरी मां ने अभी कुमाउँनी में संस्कार गीत की एक पुस्तक प्रकाशित की है। तो हर एक अवसर के लिए एक गीत है, कहानी है, कल्पनाशीलता है। इससे उपजते हैं हमारे प्रोफेशन, मीडिया, मीडिया, कम्युनिकेशन, राइटिंग, आर्ट। मैं मुख्यमंत्री से इस बारे में संवाद कर चुका हूं कि उत्तराखंड में सिर्फ रीजनल इंस्टीट्यूट नहीं वर्ल्ड क्लास फ़िल्म इंस्टीट्यूट होना चाहिए। वर्ल्ड क्लास कम्युनिकेशन इंस्टीट्यूट यहां होना चाहिए जो पहले यहां के लोगों को फायदा देगा ही, साथ ही यहां की ख्याति भी बढ़ाएगा।

इसके बाद यहां से बहुत टैलेंट निकलेगा क्योंकि प्रतिभागियों की यहां कोई कमी नहीं है। यहां अवसरों की बढ़ाने की जरूरत है। इसे मैं बहुत ही महत्वपूर्ण समझता हूं। दूसरी बात महिलाओं की जो भागीदारी है, मुझे लगता है कि कोई इस बात पर शक नहीं कर सकता कि शिक्षा के क्षेत्र में हम आगे हैं। प्रदेश की महिलाएं आगे बढ़ती हैं, रिस्पोंसबीलिटी हैं।

मैंने बहुत पहले एक गीत लिखा था जो मैंने यहीं से प्रभावित होकर महिलाओं के लिए लिखा था कि "सने हाथ माटि की खुशबू लिए, रची धूप माथे पर बूंदे लिए, जाने कितने बाजू तू बाहों में लिए, कितनी रहतें अपनी छांव में लिए। जिस फूकनी से चूल्हा जलता है....

तेरी बांसुरी से चूल्हे जले, तू यह साज छेड़े तो जीवन चले, फसलों में बालियां हैं तेरे कान की टीका करे तुझे हवा, मौसम सलामी दी रहा, धूल से करे तो सृंगार, बहती चली जा तू है धार, इस जमीं को सवार....इस जमीं को सवार... "सने हाथ माटि की खुशबू लिए, रची धूप माथे पर बूंदे लिए"।

यह गीत मैंने डेडिकेट किया था और पहली बार जब मैं फ़िल्म इंडस्ट्री में पहुंचा था अमिताभ बच्चन ने मुझे एक लेटर लिखा था यह गीत सुनकर। तब मुझे लगा मेरे अंदर कोई पोटेंशियल है। क्योंकि मेरी शब्दावली बहुत अलग थी उसके बिंब बहुत अलग थे। तो मुझे लगता है कि यहां की महिलाओं में जो पोटेंशियल है। महिलाएं सिर्फ घर को संभाल लेती हैं इससे कई ज्यादा वे लीडरशिप रोल में आगे आएं। आगे बढ़कर और भागीदारी उनकी बढ़े इस दिशा में भी काम हो सकता है। मुझसे आग्रह है कि एक दो कविताएं में सुनाऊं तो मैं एक दो कविताएं  आपको सुनाकर अपनी बात समाप्त करता हूं।

कि बंजर धरती के सीने पर पैर पटक के नन्हा अंकुर, एक हरी सी जिद पर उतरे मुमकिन है,

सूरज मुट्ठी के अंदर हो और दरारों से उंगली की छलक रोशनी फर्श पर बिखरे....मुमकिन है,

पर्वत के माथे से उतरे एक पगडंडी, बड़े विशाल नदी सागर से मिलने जाए मुमकिन है,

रात अंधेरी किसी सड़क पर एक लैंप के नीचे कोई सपनों के पन्ने पलटाये और तक़दीर पर हंसता जाए मुमकिन है,

ख्वाबों को आंसू नहलाना और फिर धुले-धुले ख्वाबों को देखना फिर से देखते जाना...मुमकिन है,

एक मासूम सा कागज लेकर बनाकर कश्ती अरमानों की एक सफर पे चलते जाना मुमकिन है,

हाथ बढ़ाना, बादल छूना और निचोड़ के एक बादल से होंठ भीगाना मुमकिन है,

एक सच्चे से सुर की उंगली थाम के बढ़ने और नवेली सरगम गाना मुमकिन है,

बीचोबीच हथेली के एक नारंगी अंगारा रखना, रूह तलक फिर सुलगते जाना मुमकिन है

आने वाले कल की आहट दूर से सुनना और दरवाजे खोलकर रखना राह सजाना मुमकिन है,

घने दरख्तों के साये में पतझड़ की तकलीफ सोचना मुमकिन है,

खिली खिली सी धूप की रुत में सरस रात की टीस सोचना मुमकिन है,

चांद पर जाकर बुढ़िया अम्मा का चेहरा हाथों में लेकर दर्द पूछना मुमकिन है,

झील में जाकर उसके दिल की गहराई से खामोशी की वजह पूछना मुमकिन है,

एक दीपक का तूफानों से आओ खेलो कहकर मस्ती में लहराना मुमकिन है

आंख हज़ारों पर एक सपना मुमकिन है, प्यास हज़ारों पर एक बारिश मुमकिन है....। 

अंत में बिना जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि दिए हुए मैं अपनी बात को समाप्त नहीं कर सकता। कुछ ही समय पहले में उनसे मिला था और अक्सर मिलता रहता था। फिल्मों के बारे में वह चिंतित रहते थे, बात करते थे कि किस तरह से आर्मी का कॉन्ट्रिब्यूशन, उसका चित्रण होना चाहिए। वह मुझसे इस बारे में काफी चर्चा किया करते थे, और जब मैंने उनके बारे में सुना तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, अभी भी नहीं होता है। अंत में मेरा एक गीत था आपने सुना होगा फ़िल्म मणिकर्णिका में था...।

देश से है प्यार तो हर पल यह कहना चाहिए....

मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए....

मेरी नस-नस तार करदो और बनादो एक सितार....

राग भारत मुझपर छेड़ो और झंझनाओ बार-बार....

देश से यह प्रेम आखों से छलकना चाहिए....

मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए....

पीस दो मुझे मिला दो मुझे रास्तों में खेत में....

चुरा चुरा बिखरे मेरा पर्वतों में रेत में....

अपनी मिट्टी में मेरा अस्तित्व मिलना चाहिए....

मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए....

शत्रु से कहदो जरा सीमा में रहना सीख ले....

यह मेरा भारत अमर है सत्य कहना सीखले....

भक्ति की इस शक्ति को बढ़कर दिखाना चाहिए....

मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए....

है मुझे यह सौगंध भूलूं न एक क्षण तुझे....

रक्त की हर बूंद तेरी है तेरा अर्पण तुझे....

युद्ध यह सम्मान का है मान रहना चाहिए....

मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए.....

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