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उत्तराखंड ही बने भावी पीढ़ी का भाग्यनिर्माता – राजेंद्र सिंह, महानिदेशक कोस्ट गार्ड

December 8, 2019
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उत्तराखंड ही बने भावी पीढ़ी का भाग्यनिर्माता – राजेंद्र सिंह, महानिदेशक कोस्ट गार्ड
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तरुण अवस्था ऐसी होती है, जब उस अवस्था के बच्चे की दशा-दिशा का निर्धारण होता है। इसमें मदद करते हैं, उसके माता-पिता, रिश्तेदार और आसपास के लोग। ठीक ऐसी ही स्थिति आज उत्तराखंड के साथ है। बहुत कुछ किया गया है, मुख्यमंत्री जी ने भी काफी चीजों का यहां जिक्र किया और लगता है कि उत्तराखंड में काफी कुछ हो रहा है। जहां तक रैबार का संबंध है, घर वापसी की बात होती है। अच्छा लगता है क्योंकि पलायन बड़ी समस्या है। अगर महर्षि वाल्मीकि की आप रामायण देखेंगे तो जब प्रभु राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी तो लक्ष्मण ने आकर कहा कि अब ये स्वर्णमयी लंका हमारी हुई, इस पर प्रभु राम ने कहा कि मुझे ये सोने की लंका अच्छा नहीं लगती है क्योंकि मेरे लिए मेरी जन्मभूमि मां के समान और वह सबसे बढ़कर है। तो ये जन्मभूमि के लिए हमारा प्यार है। हम जहां भी हों दिल्ली, मुंबई या और कहीं। हम छोटे-छोटे गांवों से निकले हुए लोग हैं, छोटे शहरों से निकले हुए लोग हैं, जो एक मुकाम हासिल करने निकले हैं। आज हम किसी मुकाम पर पहुंचे जरूर हैं लेकिन दिल में एक बात है कि हमें वापस अपनी जड़ों में जाना है। इसी बात को लेकर आज हम यहां खड़े हैं। एक टीस यह है कि उत्तराखंड को अभी बहुत कुछ करना है ताकि आने वाला जो समय है, उसमें एक नया उत्तराखंड हम लोगों के सामने हो। ताकि भावी पीढ़ी का भविष्य हम इसी उत्तराखंड में देखें। उनका भाग्य निमार्ता यही उत्तराखंड बने, ये हमारी पहल होनी चाहिए। 


मुख्यमंत्री जी मैं आपको इसलिए भी बधाई देता हूं कि जब प्रधानमंत्री यहां आए थे तो उन्होंने कहा था कि उत्तराखंड को डबल इंजन की जरूरत है। आज केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकारें हैं। चाणक्य ने भी कहा है कि अकेला पहिया गाड़ी नहीं खींच सकता। आज दोनों पहिए आपके साथ हैं। मुख्यमंत्री जी जो प्रदेश के सेनापति हैं, उन्होंने दोनों पहियों को, चाहे वो सुरक्षा बलों से जुड़े अधिकारी हों, या प्रशानसिक पदों में शीर्ष पर बैठे लोग हों, चाहे रेलवे हो या पैरा मिलिट्री फोर्स या अन्य कोई, सब लोगों को यहां लाके खड़ा कर दिया है। यानी सेंटर का एक पहिया यहां लाके खड़ा कर दिया है और दूसरा पहिया मेरे सामने राज्य के नीति निर्धारक बैठे हैं। जब ये दोनों पहिए साथ चलेंगे तो कोई भी ऐसी बात नहीं होगी जहां से हम उत्तराखंड को आगे न ले जा सकें। हम कोशिश करेंगे और कोशिश रंग लाएगी ये मेरा मानना है। 


बहुत अच्छी बात है कि आज गांवों तक रोड पहुंच गई है लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि इन सड़कों का मेंटीनेंस होता रहे। रुड़की से यहां आने में अगर साढ़े तीन घंटे का समय लगेगा तो उन सड़कों का क्या इस्तेमाल होगा। इन सड़कों की ओर थोड़ा ध्यान दिया जाना चाहिए। आज चीन सीमा हो, नेपाल सीमा हो, वहां से सटे गांव खाली हो रहे हैं, उनमें शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ाया जाए। स्कूल हमने जरूर बनाए हैं लेकिन क्या हम क्वॉलिटी एजूकेशन दे पाए हैं। बहरहाल, इस पर आगे के सत्र में चर्चा होगी। जहां तक बात करप्शन की है, तो हमें अपनी नौजवान पीढ़ी के साथ काम करने की आवश्यकता है। आज ही मैंने अखबार में पढ़ा कि आईएएस अधिकारी कॉलेज के बच्चों के साथ डॉयलॉग करेंगे। ये हम कोस्ट गार्ड में भी करते हैं। लुकिंग बियोंड सी नाम से एक सीरीज हमने चलाई है, इसमें हम हर महीने किसी खास शख्सियत को बुलाते हैं और अपने लोगों से उन्हें रू-ब-रू करवाते हैं। ताकि उनका भी मार्गदर्शन हो और वे आगे के हर विषय पर जानकारी ले सकें। कहने का अर्थ यह है कि अगर ऐसी चीजें शुरू हुई हैं तो इसे सिर्फ उत्तराखंड दिवस तक सीमित न रखा जाए। बल्कि हर महीने या तिमाही में डीएवी कॉलेज, डीवीएस कॉलेज, महादेवी कन्या पाठशाला, गुरू रामराय पब्लिक स्कूल के बच्चों के साथ रू-ब-रू करवाया जाए तो बहुत अच्छी पहल होगी। आप हम लोगों को बुलाइये, हमें कुछ नहीं चाहिए। आप बस हमें बताइये कि हमें उत्तराखंड में किस जगह किस कॉलेज में आना है, हम वहां आने, मोटिवेशनल लेक्चर देने को तैयार हैं। जैसे अभी कहा गया कि पूरा वन हमारा है। छह राज्यों को जल हम दे रहे हैं, गंगा-जमुना सभ्यता हमने शुरूआत की है, फॉरेस्ट हमारे पास सबसे ज्यादा है। आॅक्सीजन हम सबसे ज्यादा पैदा कर रहे हैं। इसके साथ-साथ मैंने एक फामूर्ला निकाला था एच2सी का। ओनेस्टी, हार्डवर्क एंड कमिटमेंट ये सिर्फ उत्तराखंड के डीएनए में है और कहीं आपको ये चीज नहीं मिलेगी। तो क्यों न हम इस डीएनए का इस्तेमाल करें और हर भारतवासी के पास जाएं और बताएं कि ईमानदारी और मेहनत में हमारा कोई सानी नहीं है। ये हमने पहले भी किया है। कर भी रहे हैं और ये मेरी आशा है कि भविष्य में जो नई पीढ़ी आ रही है, वो इस बात को समझेंगे और इस बात को करेंगे। हम उस उत्तराखंड के लोग हैं जिनमें वो जज्बा है। क्योंकि ईमानदारी, मेहनत और प्रतिबद्धता हमारे डीएनए में है। 


मैं एक बात कहना चाहूंगा कि आप आंकड़ों को देखें तो 416 शहरों का एक सर्वे हुआ है, उसमें हमारा देहरादून 332वें नंबर पर है। क्या हम शीर्ष 100  नहीं आ सकते, क्या हमारा लक्ष्य शीर्ष 50 नहीं होना चाहिए। हम शीर्ष 10 की क्यों नहीं सोचते। कौन रोकता है हमें। नैनीताल की संख्या 222 और हरिद्वार 212 पर है। देहरादून से अच्छा रुड़की है, 218 पर है। चार शहर उत्तराखंड से लिए हैं और चारों 200 के बाद हैं। छोटे-छोटे शहर हैं, सिर्फ युवाओं को प्रेरित करने की जरूरत है, साफ-सफाई के लिए। एक तरफ से देख लीजिए, बिजली के खंबों पर कहीं कोई नेता टंगा है कहीं कोई। इन चीजों को छोड़ दीजिए। ये पोस्टर झंडे लगे हुए हैं, हमारा शहर गंदा कर रहे हैं। कई जगह होर्डिंग्स लगे हैं, इन होर्डिंग्स को हम मेंटेन कर सकें, किसी को भी यह काम दे दीजिए। अगर हम इन्हें मेंटेन कर सके तो भी काफी अच्छी चीज होगी। 


डीएवी कॉलेज में चले जाएं, पूरी दीवार पोस्टरों से पटी पड़ी है। लगता ही नहीं है कि ये डीएवी कॉलेज है। रास्ते में आ जाएं तो दलों के पोस्टर टंगे हुए हैं। कौन हैं ये बिट्ट भैय्या उर्फ विवेक, शंभू भैय्या उर्फ कुछ जन्मदिन की बधाई। ये बहुत हो गया है। हमें मुख्यमंत्री जी के सानिध्य में शहर की सफाई को आगे बढ़ाना है। 2018 में जो सर्वे हो उसमें हमें देहरादून के लिए शीर्ष 100 में आने का लक्ष्य रखना है। आप एक कदम चलिए, हम सेंटर से दो कदम चलने को तैयार हैं। बस आगे आइये। 

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