हमारे लिए सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे प्रेरणास्रोत भी यहां मौजूद हैं, अपने क्षेत्र में कौन से मानदंड स्थापित करें, किस रोल मॉडल को अपनाएं, उनको हम देखते हैं, सुनते हैं। आज उनके साथ हम मंच साझा कर रहे हैं। दूसरा खुशी का मौका यह है कि इस मंच के माध्यम से हमें अपने राज्य से अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका मिला है। अभी तक जो भी बताया गया उससे देखकर यह भी लगता है कि हम और क्या दे सकते हैं। अब बात यह कि अगर कुछ भी न हो लेकिन जुनून हो तो समझो आपने आधा सफर तो तय कर ही लिया है। ये बहुत छोटे-छोटे अवसर होते हैं। हम यहां से बाहर भी रहे और देश से भी बाहर रहे। लेकिन मेरे लिए आंख खोलने वाली घटना वह थी जब मेरा बेटा जब पांचवीं में पढ़ता था तो उसने कहा, डैडी गूगल अर्थ पर अपना गांव दिखाओ। मैं उस समय न्यूयॉर्क में था। ज्यादा समय बाहर ही रहा। लेकिन अच्छा लगा कि बेटे को हमारे गांव के बारे में जानने की इच्छा है। बहरहाल, गूगल की मदद से उसको अपना गांव की लोकेशन दिखाई। तब मन में यह विचार आया कि क्या हम अपनी भावनाओं को अपनी अगली पीढ़ी को दे पाए हैं, जो हमारे पूर्वजों ने हमको दी। तो आज भी हमारा प्रयास रहता है कि हम साल में दो बार अपने घर जाएं।
एक दो बातें मैं कहना चाहता हूं। गर्ल चाइल्ड की बात आई, लिंगानुपात की बात आई, शिक्षा की बात आई। पलायन की बात आई। आज डेवलपमेंट की परिभाषा बदल गई है। आजकल आंगनवाड़ी में बच्चों की बांह की नाप ली जाती है। यह भी डेवलपमेंट का एक मानदंड है। कहीं आपके बच्चे की बांह एक निर्धारित मानदंड से कम तो नहीं है। तो जब डेवलपमेंट की परिभाषा बदल रही है, क्लाइमेट की परिभाषा बदल रही है, प्राकृतिक संसाधनों की परिभाषा बदल रही है तो उत्तराखंड के डेवलपमेंट के प्रयोजन में भी बदलाव आएगा। इस संदर्भ में हिमालयन डेवलपमेंट की एक कमी है। भारत जो दुनिया की सबसे बड़ी पर्वत श्रंखला का गृह राज्य है और जो इस मामले में लीड ले सकता है, उस भारत में हिमालयन डेवलपमेंट को कांडला, मुंबई, हैदराबाद के डेवलपमेंट मॉडल के साथ जोड़कर रखा जाता है। तो क्या इसमें कोई पहल हो सकती है। क्या हमारी इकोलॉजी, इको सिस्टम में कोई सेंसिविटी है, जिससे सामने रखकर हिमालयन डेवलपमेंट का कोई नया मॉडल लाया जाए। दूसरा मैं पर्यावरण की बात करना चाहता हूं क्योंकि यह चिंतित करने वाला क्षेत्र है। जब हमने केदारघाटी की तबाही का मंजर देखा तो यह काफी दुख देने वाला था। लेकिन जब राष्ट्रीय परिदृश्य में चर्चा होती है तो क्या आता है, वेस्ट डेवलपमेंट, पॉलीथीन बंद कीजिए। होम स्टे टूरिज्म कीजिए। मैं यह कहने का प्रयास कर रहा हूं कि आज भी हमारी जो चर्चाएं हैं, वो घटनाओं से जुड़ी नहीं हैं। मेरे बड़े भाई जेएनयू में प्रोफेसर हैं, उन्होंने क्लाइमेट साइंस पर काफी काम किया है। उन्होंने ऊखीमठ, रुद्रप्रयाग में बादल फटने की घटना पर पेपर प्रकाशित किए हैं, जापान और अमेरिका में। लेकिन आज हमारे सिस्टम में एक लूप होल है कि हम वो संवाद नहीं स्थापित कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि ये जो प्राकृतिक आपदाएं हैं, ये एक ऊर्जा प्रणालियां हैं। ये ऊर्जा जो पहले दो साल में, छह महीने में रिलीज हो जाती थी, आजकल ये चार घंटे में रिलीज हो जा रही है। हम इस पर संवाद को कैसे बढ़ाएं, इसके लिए हमें अपनी सीमाओं से बाहर निकलना होगा। इसके लिए जो आज हो रहा है ऐसा ही संवाद होना चाहिए। दूसरा क्या हम हिमालय को सामने रखते हुए एक नए डेवलपमेंटल पैराडाइम को सामने रखते हुए नए संसाधनों की बात करें।












