Home Raibaar Summit निर्धारित आय न होने से बढ़ा पलायन – एसएस नेगी, उपाध्यक्ष, पलायन आयोग, उत्तराखंड
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निर्धारित आय न होने से बढ़ा पलायन – एसएस नेगी, उपाध्यक्ष, पलायन आयोग, उत्तराखंड

मेरा हिमाचल प्रदेश कैडर था। ज्यादा सेवा दिल्ली और हिमाचल में ही रही। हमेशा लगता था कि कोई अनौपचारिक रूप से शामिल करेगा, उत्तराखंड के साथ काम करने के लिए, क्योंकि औपचारिक रूप से राज्य से बाहर के कैडर के होने के चलते ऐसा नहीं हो सकता था। 17 साल हो गए इस राज्य को बने हुए, मुख्यमंत्री जी ने बड़ी पहल ये की है कि जो लोग राज्य से बाहर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें एक मंच पर लाने का काम किया है। इसके लिए हम उनकी सराहना करते हैं। उम्मीद करते हैं कि ये पहल आगे भी चलेगी। छह महीने बाद ऐसी बैठक शायद देहरादून में नहीं बल्कि अल्मोड़ा, पौड़ी, गोपेश्वर, पिथौरागढ़ या किसी दूसरी जगह होगी। क्योंकि समस्याएं वहां ज्यादा हैं। 


कुछ आंकड़े इस संबंध में मेरे पास हैं, 968 गांव 2001 और 2011 की जनगणना के बीच में खाली हो गए हैं। लेकिन वो सारे गांव पहाड़ के नहीं हैं। गांव जो खाली हुए हैं, वो मैदानी इलाकों के भी हैं। पौड़ी और अल्मोड़ा में ये समस्या ज्यादा सामने आई है। मैंने 1901 से आंकड़े निकाले, क्योंकि हमारे देश में 1901 से जनगणना की शुरूआत हुई। जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं तो जब 1911 और 1921 की जनगणना हुई थी, तब भी पहाड़ों की आबादी खाली हुई थी, पहले विश्वयुद्ध, किसी आपदा के चलते संभवतरू पहाड़ों से आबादी कम हुई। लेकिन जब आप 2001 से 2011 के बीच देखते हैं तो पौड़ी और अल्मोड़ा में तो माइनस में ग्रोथ चली गई है। करीब 17, साढ़े 17 हजार लोग माइनस में चले गए हैं। लेकिन टिहरी, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ में भी समस्या गंभीर है। हालांकि स्थिति माइनस में नहीं है। ये भारत सरकार के आंकड़े हैं। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक, जो हमारे 968 गांव व्यक्ति विहीन हो गए हैं। 1000 गांव ऐसे भी हैं, जहां आबादी 100 से कम है। हालांकि पहाड़ी गांवों में आबादी प्राकृतिक तौर पर कम होती है। एक चैंकाने वाली समस्या है, जो हमारी आय में अंतर है। एनआईआरडी हैदराबाद की एक रिपोर्ट कहती है, पहाड़ी इलाकों में लोगों की आय और मैदानी इलाकों में लोगों की आय में काफी अंतर है। इसलिए चिंता का कारण यह भी है क्योंकि 10 पहाड़ी जिलों में हमारी 48 फीसदी आबादी है। 52 फीसदी आबादी हमारी तीन जिलों में रह रही है। शहरों पर दबाव बहुत बढ़ गया है। ये चिंता का एक विषय है, मैं सबके सामने ये मुद्दे रखना चाहता हूं। कृषि मंत्रालय के डेटा के अनुसार हमारा नेट्स ओन एरिया 2001 के मुकाबले 2014 में 10 फीसदी घट गया है। जो लोग पहाड़ में रह रहे हैं, उनमें से 65 प्रतिशत के पास कम काम है। यानी उन्हें सभी दिन रोजगार नहीं मिल रहा। मनरेगा पर निर्भर हैं। इसलिए वहां से डिस्ट्रेस माइग्रेशन हो रहा है। हम लोगों ने भी पढ़ने के बाद पलायन किया लेकिन वो डिस्ट्रेस माइग्रेशन नहीं था। आप जब पढ़ गए तो आपकी स्किल कृषि के लिए नहीं है। आपका स्किल लेवल बढ़ गया तो आपको अपने अनुसार काम पहाड़ में नहीं मिलेगा। लेकिन जो डिस्ट्रेस माइग्रेशन हो रहा है उसकी क्या वजह है। हमने कुछ लोगों से पूछा कि आप 15 हजार रुपये के लिए लेह के होटल में काम कर रहे हो, तो उनका कहना था कि ये हमारी एश्योर्ड (सुनिश्चित) इनकम है। वहीं अगर वह पहाड़ में मनरेगा में कर रहा है तो उसे 100 दिन मिलेगा, नहीं मिलेगा, ये भी एक सवालिया निशान है। बारिश हुई, खेती हो गई, कमाई हो गई लेकिन बारिश नहीं हुई तो खाली। यानी एक तय कमाई नहीं है। हर परिवार चाहता है कि कुछ नियमित कमाई होती रहे। इसलिए वह 15 हजार रुपये के लिए भी घर से पलायन कर रहा है। 

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