डॉ. मनमोहन सिंह चौहान, डायरेक्टर, आईसीएआर
मैं कृषि वैज्ञानिक हूं, खासतौर से मैं जानवरों को डील करता हूं और इस समय केंद्रीय बकरी संस्थान, मथुरा में निदेशक के पद पर हूं। पिछले तीन साल से मैं वहां पर हूं। जैसे ही मैंने यह पद संभाला, उसके तीसरे दिन से मैंने शुरू किया कि हमारे उत्तराखंड के लिए क्या एक्शन प्लान है। उत्तराखंड लाइफ स्टाक बोर्ड से मैंने बात की उसके अलावा यहां पर सीप एंड ऊन डेवलपमेंट बोर्ड है, उनसे बात की।
एक छोटा सा प्रोग्राम हमारा पंत नगर यूनिवर्सिटी में चलता है और उस प्रोग्राम को भी ढंग से बजट नहीं मिलता। तो फिर मैंने सोचा कि इससे तो काम नहीं चलेगा फिर मैंने पूछा कि इसके लिए फंड कितना मिलता है तो मुझे पता चला कि इसके लिए 18-20 लाख का फंड है। फिर मैंने इस फंड को बढ़ाकर इसे 42 लाख के आसपास कर दिया। मुझ पर यह लांछन भी लगा कि डॉक्टर साहब पूरे देश के नहीं है केवल उत्तराखंड के लिए बकरियों के डायरेक्टर हैं। मैंने कहा यह तो होता रहता है। हम बात करते हैं पलायन की। मैं कई समाचार पत्रों में पढ़ता हूं कि एक गांव में केवल एक परिवार ही रह रहा है और अब उसने भी अपना घरबार छोड़ दिया है।
जैसे कि हम आर्गेनिक फार्मिंग की बात करते हैं और जैसा कि मुख्यमंत्री जी ने कहा कि बाईडिफाल्ट हम आर्गेनिक हैं। तो इसका मतलब यह है कि अगर जिस गांव से पलायन हो रहा है हम वहां पर बकरी पालन करें। मेरा मानना है कि बकरी पालन में जीरो इनपुट है और मैक्सीमम आउटपुट है। समय-समय पर हमारे यहां से ट्रेनिंग प्रोग्राम होते रहते हैं और उसमें लोगों का रूझान है कि बकरी पालन में बड़े-बड़े अच्छे लोग आ रहे हैं। मैं चार बकरी, दस बकरी या बीस बकरी की बात नहीं कर रहा हूं।
मैं बात कर रहा हूं 200 बकरी से 500 बकरी तक। हमने देखा है कि अगर आप 100 बकरी पालते हैं तो आपकी सालभर में एक लाख से डेढ़ लाख तक की इनकम होती है। कम से कम हम बकरी पालन से कुछ हद तक पलायन को रोक सकते हैं। आपने देखा होगा कि चांगथांग, लद्दाख और चीन से लगे सीमावर्ती इलाकों में जो बकरी वाले या भेड़ वाले हैं उनसे यह सूचना मिलती थी कि सीमा के आसपास कुछ न कुछ हरकत हो रही है।
कारगिल युद्ध इसका एक उदाहरण है कि जिसमें बक्करवालों ने सूचना दी कि पाकिस्तान ने हमारे इलाके में घुसपैठ कर रखी है। एक प्रकार से हम बकरी पालन से अपनी देश की भी सेवा कर सकते हैं। मैं मुख्यमंत्री जी से किसी दिन समय लेकर इस बारे में चर्चा करूंगा कि इस विषय पर क्या-क्या हो सकता है और किस प्रकार से हम बकरी पालन से उत्तराखंड का विकास कर सकते हैं। मैं सभी लोगों से यह भी कहना चाहता हूं कि हमारे उत्तराखंड में साइंस और टेक्नोलॉजी की जो भी स्कीमें चल रही हैं, हम उसका फायदा उठायें। बकरी, भेड़, गाय, भैंस से जो भी उत्पादन होगा उससे भी हमारे उत्तराखंड का विकास होगा।












