योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश
…. 1986 में मैं टिहरी आया था और आज मुझे लगभग 33 वर्षों के बाद यहां आने का अवसर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने दिया है। मैं उनका आभारी हूं कि रैबार-2 के बहाने ही सही उन्होंने मुझे इस देवभूमि से जुड़ने का अवसर दिया है। मैं उनका और रैबार-2 से जुड़ी हुई टीम का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं और अपनी शुभकामनाएं भी देता हूं।
अपनी भूमि से जोड़ने का एक अभिनव प्रयोग और प्रयास है रैबार-2। उत्तराखंड के चार धाम के प्रति देश और दुनिया के प्रत्येक सनातन हिंदू धर्मावलंबी पूरी आस्था रखते हैं। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां उत्तराखंड ने देश को दी हैं। उत्तर भारत की सबसे उर्वरा भूमि के पीछे का कारण उत्तराखंड से निकलने वाली गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां ही हैं। गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक लगभग ढाई हजार किमी का यह भूभाग इतना समृद्ध है कि अकेले पूरी दुनिया का पेट भरने की क्षमता रखता है। मां गंगा और यमुना की कृपा और पुण्य के कारण ही उत्तर भारत की भूमि इतनी उर्वरा हुई है। स्वाभाविक रूप से इसका श्रेय उत्तराखंड को जाता है और जाना भी चाहिए।
उत्तराखंड का वासी जहां कहीं भी गया है, वहां की समृद्धि में उसने प्राण, प्रण से लगकर अपना योगदान किया है। देश की सेना के साथ-साथ अनेक क्षेत्रों की महान विभूतियां उत्तराखंड ने दी हैं। उत्तर प्रदेश की स्थापना के समय से अब तक उत्तराखंड ने अनेक मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत, नारायण दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा दिए हैं। एक लंबी श्रृंखला उत्तराखंड से चलती है। सेना में जाकर यहां के नौजवानों ने देशसेवा की है। यहां वीर माताओं-नारियों का सम्मान करते हुए मुझे गौरव की अनुभूति हो रही थी कि जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन राष्ट्रमाता के लिए समर्पित किया, आज उनको सम्मानित करने का गौरव हम सबको प्राप्त हो रहा है।
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देखते ही देखते उत्तराखंड को बने 19 साल हो गए हैं और राज्य ने इन वर्षों में विकास की लंबी यात्रा प्रारंभ की है। वर्तमान नेतृत्व ने उत्तराखंड के लिए जो दिशा तय की है, मैं कह सकता हूं कि राज्य में असीम संभावनाएं हैं। राज्य के विकास को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए बनाई गई सरकार की योजनाएं स्वागतयोग्य है। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि उत्तराखंड की यात्रा उसे वहां तक पहुंचाएंगी कि न सिर्फ फिल्म शूटिंग के लिए बल्कि देश और दुनिया के हर प्रकार के पर्यटकों के लिए- चाहे वह श्रद्धालु के रूप में तीर्थाटन के लिए आएं, चाहें वह एक पर्यटक के रूप में यहां आएं, उन सबके लिए एक बेहतर डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित होगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
माननीय त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एक बार अपनी कैबिनेट की बैठक ही इस झील के किनारे की थी। कितनी बेहतर झील है, इसे हम थोड़ा प्रमोट कर लें और कैबिनेट को बुलाकर ब्रांडिंग का प्रयास करें तो मैं कह सकता हूं कि टिहरी झील के सामने कश्मीर की डल झील फेल हो जाएगी। कितना बढ़िया पानी है, कितना सुखद वातावरण है और उत्तराखंड के अंदर की इन संभावनाओं को हम स्वयं भी मजबूती के साथ बांधकर चलें तो स्विट्जरलैंड आपसे बहुत पीछे छूट जाएगा। यहां की सहजता, सरलता, कर्मठता, चुनौतियों से जूझने की जज्बा यह उन संभावनाओं को टटोलती है। यहां फिल्म शूटिंग के साथ-साथ ईको टूरिज्म, हेरिटेज टूरिज्म, वाइल्ड लाइफ, चार धाम यात्रा के साथ-साथ यहां के डांडों में किसी न किसी देवता का स्थान है।
मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि मैंने इसी उत्तराखंड में जन्म लिया और शिक्षा अर्जित की। यहां रहकर मैंने हर गांव, कस्बे और नदी को करीब से देखा है। इस टिहरी जनपद से ही मैंने हाई स्कूल पास किया था। 1986-87 के बाद आने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था। चुनाव में आया था लेकिन अन्य क्षेत्रों में ही जा पाया था। चुनाव में आधे घंटे का ही ट्रिप होता है और उसके बाद दूसरी सभा में जाना होता है। अपने कार्यक्रम को सूर्यास्त से पहले समेटना होता है। आज मैं फुरसत से आया हूं, काफी अच्छा लग रहा है। जब मैं 1986 में आया था, तब पुरानी टिहरी थी। तब से आज के दृश्य में काफी अंतर आया है। उस समय पुरानी टिहरी थी। मैं देख रहा था नई टिहरी को, उस समय नई टिहरी बस रही थी। आज वह अपने विकास को लेकर चिढ़ा रही थी। टिहरी ने यह साबित किया है।
पढ़ें, बस यही रैबार…मिलकर बढ़ाएं विकास की रफ्तार
विकास के लिए सकारात्मक सोच होनी चाहिए। सकारात्मक सोच को अगर हम टीम भावना में मिलकर आगे बढ़ाएं तो बहुत कुछ बदल सकता है। प्रतिव्यक्ति आय तेजी से बढ़ा है। लगभग हर परिवार से एक व्यक्ति पुलिस या सेना में अपना योगदान कर रहा है। बड़े प्रोजेक्ट में दिक्कत हो तो हम हाइड्रो पावर के छोटे प्रोजेक्ट बना सकते हैं। सोलर के साथ-साथ यहां विंड एनर्जी की भी काफी संभावनाएं हैं। यहां किसी भी डांडे पर आप विंड एनर्जी का सिस्टम लगाइए तो वह 25 साल तक आपको बिजली देता रहेगा। यहां पर बागवानी की संभावनाएं हैं। अलग-अलग क्लस्टर बनाकर प्रयास किए जा रहे हैं। विकास की संभावनाएं हम नीचे देखने का प्रयास कर रहे हैं, हम विकास की संभावनाओं को यही पर देखें। इसमें सरकार से ज्यादा यहां के लोगों को जुड़ना होगा। आलोक जोशी जी, राजेंद्र सिंह जी जैसे लोग, जो रिटायर हो चुके हैं यहां आना चाहिए, रहना चाहिए। उन्हें स्थानीय लोगों से संवाद बनाना चाहिए। स्थानीय लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि पलायन से काम नहीं चलेगा। यहीं पर संभावनाएं तलाशिए। सौभाग्य की बात है कि उत्तराखंड के पास हाइड्रो पावर, सोलर, विंड पावर, टूरिज्म की संभावनाएं हैं और विकसित की जा सकती हैं।
पीएम मोदी की प्रेरणा से हमारी सरकार काशी-विश्वनाथ मंदिर को केंद्र में रखकर पर्यटन विकास की बड़ी संभावनाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। आज से 2 साल पहले तक लोगों को 5 फीट की संकरी गलियों से होकर जाना पड़ता था। हमने व्यापक कार्ययोजना बनाई और आज 5 फीट नहीं मंदिर तक जाने के लिए 50 फीट चौड़ा रास्ता आपको मिलेगा। इतना ही नहीं, मां गंगा के साथ भगवान विश्वनाथ का सीधे संपर्क और संवाद हो, इसके लिए हमने 200 फीट चौड़ा रास्ता मां गंगा तक जाने के लिए बनाने की कार्यवाही शुरू की है। पूरे क्षेत्र का हम सुंदरीकरण कर रहे हैं। वहां की जनता ने सहयोग किया। 300 ऐसे घर थे, जो 100 साल से लेकर 200 साल पुराने थे। हमने उनके साथ यह बात रखी कि भगवान विश्वनाथ के आसपास के क्षेत्र का सुंदरीकरण करना है, सभी ने स्वेच्छा से अपना घर दे दिया। हमने घर हटाकर पुराने मंदिरों जीर्णोद्धार किया।
हमने लोगों से कहा कि बहुत लोग आते हैं। यहां पर प्रशिक्षित गाइड रखें। आने वाला व्यक्ति भारत ही नहीं, दुनिया से आने वाले शोधार्थी भी होगा, उन्हें बताने वाला एक अच्छा गाइड होना चाहिए। हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत बोलने की क्षमता हो। उस हिसाब से उन्हें ट्रेनिंग दी जाए। शुरू में हमने 30 गाइड रखे। मुझे लगता था कि 30 गाइडों को मंदिर ट्रस्ट से पैसा देना पड़ेगा। आप आश्चर्य करेंगे कि एक भी पैसा ट्रस्ट से देने की आवश्यकता नहीं पड़ी। आज हमने लगभग 100 से ज्यादा प्रशिक्षित गाइड काशी विश्वनाथ मंदिर में रखे हैं। हर एक गाइड को हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत आती है, कर्मकांड का भी उन्हें ज्ञान है, वे विशुद्ध भारतीय वेशभूषा में दिखते हैं। ये गाइड 30 हजार से लेकर एक लाख रुपये महीने तक कमा रहे हैं। उनसे मंदिर ट्रस्ट पर कोई बोझ नहीं है। एक मंदिर इतने लोगों को रोजगार दे सकता है।
काशी के मंदिरों में रोज फूल निकलते हैं। पहले फूल को फेंक दिया जाता था। हमने उसे जुटाया और ग्रामीण महिलाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें सौंपा। पुष्प से इत्र, अगरबत्ती, धूप और बचे वेस्ट से कंपोस्ट बनाए जा रहे हैं। कई गांव की महिलाओं को इसके जरिए रोजगार दिया गया। आज हर महीने समूह की महिलाएं 6,000 से 10,000 रुपये महीने तक कमा रही हैं। हमने पहले चरण में चंदौली और उससे जुड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र की महिलाओं को इससे जोड़ा है। मंदिर से निकले फूलों से बने इत्र, अगरबत्ती और धूप में इतनी खुशबू है कि लोगों में उसकी काफी मांग है। लोग उसे बहुत सहेज करके लेकर जाते हैं। वे उसे प्रसाद के रूप में लेकर जाता है।
उत्तराखंड में चार धाम और हर देव मंदिरों में उसकी संभावनाएं हैं। मंदिरों के सुंदरीकरण की व्यवस्था पर्यटन के साथ-साथ जनता की भागीदारी से की जा सकती है। इससे रोजगार सृजन भी किया जा सकता है। पानी कम था तो पहले पहाड़ों में हम खाद्यान्न पैदा करते थे- कोदा और गहत होता था, बहुत सी चीजों के नाम भी भूल गया क्योंकि खाने का अवसर ही नहीं मिला है। आज उन्हीं चीजों को पौष्टिक खाद्यान्नों में गिना जाता है और हम उसे भूल गए। हमें उस ओर फिर से जाना पड़ेगा। हमें उसे आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। आपको स्वयं, लोगों को इसके लिए प्रेरित करना होगा।
हमें कुछ बुराइयों को भी दूर करना पड़ेगा। विकास के प्रति आम जन का जो भाव है, हमें वैसा ही बनाना चाहिए। देवभूमि के तौर पर लोग उत्तराखंड को देखना चाहता है। उत्तराखंड की आबादी भले ही 2 करोड़, ढाई करोड़ की होगी पर इस आबादी के साथ देश की 136 करोड़ जनता और दुनिया के श्रद्धालुजनों की भावनाएं जुड़ी हैं, जो यहां के पवित्र धामों के प्रति आस्था रखता है। कोई भी ऐसा कार्य तीर्थयात्रा मार्ग या आसपास नहीं होना चाहिए जिससे लोगों को लगे कि यह देवभूमि के अनुरूप नहीं है। किसी को भी बोलने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। कहीं पर मदिरा, मांस का सेवन कर रहे हों तो उन्हें इससे दूर किए जाने की आवश्यकता है। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि इससे आपका रोजगार नहीं बढ़ने वाला बल्कि इससे लोगों की आस्थाएं आहत होंगी। यह पर्यटकों को कम करेगा। अगर ये चीजें की जाएं तो उत्तराखंड को वह स्थान दिला सकते हैं, जिसका वह हकदार है। यहां की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने इस दिशा में बेहतर प्रयास शुरू किए हैं।
उत्तराखंड से जुड़े जो मामले थे 17 वर्षों से लटके हुए थे। आपसी विवाद चले आ रहे थे, यूपी से उत्तराखंड अलग हुआ पर समस्या बनी रही। जो समस्याएं आपसी बातचीत से हल हो सकती थीं, वो कोर्ट में चली गईं। मैं धन्यवाद दूंगा श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी को, जिन्होंने इस दिशा में पहल की और हमलोगों ने बैठकर समाधान करवाया। जब उत्तराखंड यूपी में था तो यहां के कर्मचारियों की पेंशन की राशि फंसी थी, उत्तराखंड के लोगों को पेंशन आदि कैसे मिल रहा था पता नहीं, लेकिन मुझे बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत जी के प्रयास से पिछले साल 2018-19 में हमने यूपी से 2331 करोड़ रुपये का भुगतान उत्तराखंड को कराया है। इस साल अब तक हम 1400 करोड़ का भुगतान कर चुके हैं और अंत तक कुल 3,000 करोड़ रुपये का भुगतान हम पेंशन और पीएफ का करेंगे। जिस राशि को लोगों ने भुला दिया था, उसे त्रिवेंद्र सिंह रावत वापस लाने में सफल हुए हैं। इसी प्रकार से सिंचाई विभाग में मत्स्य विभाग से 3.98 करोड़ का मामला था, उसे भी यूपी का विभाग देने के लिए सहमति दे दी है। यूपी के वन निगम ने भी 99 करोड़ उत्तराखंड वन निगम को देने पर सहमति दे दी है। यूपी के खाद्य विभाग ने 105 करोड़ रुपये, ऊर्जा विभाग ने भी 174 करोड़ रुपये का भुगतान उत्तराखंड सरकार को देने की कार्रवाई प्रारंभ कर दी है। दोनों सरकारों ने बैठकर संवाद किया तो आज आप देख रहे हैं कि हजारों करोड़ रुपये उत्तराखंड को मिलते दिखाई दे रहे हैं।
जो विभूतियां यहां आई हैं, इनके पास लंबा अनुभव है, इनका लाभ उत्तराखंड के युवाओं को मिल सकता है। इससे उत्तराखंड सचमुच में देवभूमि हर दृष्ट से बन जाएगा। मैं तो कहता हूं कि कौन ऐसा व्यक्ति होगा जो यहां जन्म लिया हो और उत्तराखंड के विकास के बारे में न सोचता हो। हमने जो श्रद्धा, ऊर्जा, आस्था अपने अंदर प्राप्त की है, वह इस भूमि की देन है।
भगवान राम ने भी लक्ष्मण से एक बड़ी बात कही थी। रावण के मरने के बाद राम ने लक्ष्मण से कहा कि जाओ, अब सीता को लेकर आओ। लक्ष्मण ने देखा कि पूरी लंका सोने की है तो वह मोहित हो गए। उनको लगा कि हमने इसे जीत लिया है तो स्वाभाविक रूप से राजा हो गए। वह राम के पास आते हैं और कहते हैं कि सोने की लंका है, क्या हम यहां और दिन रुक सकते हैं क्या। भगवान राम ने कहा था, लक्ष्मण भले ही यह लंका सोने की हो, पर यह हमारे लिए रुचिकर नहीं क्योंकि जननी और जन्मभूमि का कोई विकल्प नहीं हो सकता। हम यहां के राजा नहीं है, यहां के राजा तो विभीषण हैं।
अगर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हमारे आदर्श हैं तो हमें इस बात को याद रखना होगा कि जन्मभूमि का कोई विकल्प नहीं हो सकता है। उत्तराखंड तेजी से आगे तभी बढ़ेगा जब हम पहाड़ से पलायन को रोक सकें। यह हमारे लिए चुनौती है। हम यहां खूबसूरत वातावरण को छोड़कर हम मैदानी क्षेत्रों में जाते हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव देखने को मिलता है। आज तो पहाड़ों पर सड़क, बिजली, पानी और साधन आ चुके हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के गावों में अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, एनआईटी बने हैं। टिहरी की इस झील में टूरिज्म के लिए कॉटेज बनाकर आप दुनिया के लोगों को आकर्षित कर सकते हैं। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है। रोजगार के साथ-साथ खूबसूरत प्रकृति के बीच रहने का अपना अलग अनुभव है। यह केवल उत्तराखंड के लिए ही नहीं देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
देश की सुरक्षा से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। पलायन रुकना चाहिए। अगर हम गांव को छोड़ रहे हैं तो आने वाली पीढ़ी के साथ-साथ अपने राष्ट्र की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने की छूट दे रहे हैं। हमारे पूर्वजों ने इन पहाड़ों में तब अपना घर बनाया था जब साधन आने-जाने के लिए नहीं थे। ऋषिकेश के ऊपर वाहन नहीं चलते थे, 1962 से पहले तो नहीं थे लेकिन तब भी लोग रहते थे। उन्होंने देश की सीमाओं की सुरक्षा में अपना योगदान किया था। आज तो काफी सुविधाएं हैं।
मैं आप सभी से आवा आपुण घौर, यानी अपनी जड़ों से जुड़ने का आह्वान करता है। याद रखिएगा कि जड़ों से हिला हुआ पेड़ एक समय के बाद सूख जाता है। जब तक पेड़ की जड़ें धरती से जुड़ी हैं, वह हरा-भरा रहता है। हमें भी हरा-भरा रहना है। मैं रैबार-2 के आयोजन के लिए सभी को धन्यवाद देता हूं। ऐसे कार्यक्रम जनपदों में, स्कूलों में भी होने चाहिए।
त्रिवेंद्र सिंह रावत जी और पूरी टीम को बधाई। मां गंगा और यमुना को कोटि-कोटि नमन, जय हिंद।












