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विकास के लिए सबसे जरूरी है विजन डॉक्यूमेंट

वी एस चमोला, डायरेक्टर एचआर, एचएएल

मैं पिछले 25 साल से बेंगलुरू में रह रहा हूं। मेरा इंडस्ट्री में 37 साल का अनुभव है। पिछले 8 साल से मैं हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) बोर्ड में हूं। मैं अभी इलाहाबाद में एक कंपनी है नैनी एयरोस्पेस लिमिटेड जो एचएएल का लूम्स, स्ट्रक्चर बनाती है, मैं अभी उसके चैयरमेन के पद पर भी हूं। मैं अपने इस अनुभव के आधार पर 2-3 चीजें आपसे बांटना चाहूंगा। शेयर वही चीजें करूंगा जो कार्यन्वित हो सकें। किसी चीज के सफल होने में सबसे जरूरी विजन डाक्यूमेंट होता है।

हमारे पूरे राज्य के लिए विजन डॉक्यूमेंट काफी महत्वपूर्ण है, जो आपकी डेवलपमेंट की फिलोस्फी को गाइड करेगा। जहां मैं काम करता हूं उसका भी एक विजन डॉक्यूमेंट है। 1982 में मैंने एनटीपीसी से अपना कैरियर शुरू किया था मेरी ग्रेजुएशन और पोस्टग्रेजुएशन देहरादून से हुई और जब मैंने एनटीपीसी ज्वाइन किया तो मैंने देखा कि हर आर्गेनाइजेशन का एक विजन डॉक्यूमेंट होता हैं। उसके बाद उसका मिशन डॉक्यूमेंट होता हैं। दूसरा जो, रैबार 2 में है मैं इसमें एक दो चीज जरूर कहना चाहूंगा।

यहां बहुत ही सीनियर और काबिलियत वाले अधिकारी हैं, काबिलियत हमारे अधिकारियों में कूट-कूट कर भरी हुई है। मैं दो आस्पेक्ट पर बोलना चाहता हूं आपका जो भी विजन डॉक्यूमेंट हो ‘इट हैज टू मैच। फुटवर्क ऑन दि ग्राउंड। जिसमें हम जनरली लैप्स करते हैं।’ आज तक जो भी स्कीम मैंने देखी हैं, जो फेल हुई है, चाहे वह नेशनल लेवल पर हो या छोटे लेवल पर। आपका जो फुटवर्क ग्राउड है अगर वह मैच नहीं करता है, तो ऐसा होता है। 

मुझे एक छोटा सा किस्सा याद आ रहा था कि 1981 की बात है मैं किसी सलेक्शन प्रोसेस में जब गया तो उस समय हम सात-आठ लड़के थे और उन्होंने मुझसे पूछा कि आप कहां के हो। तो मैंने बताया कि मैं गढवाली हूं तो वह जोर से हंसे और बोले कि गढ़वाली क्या होता है। आज की तारीख में जब हमारा एक राज्य बना है तो हमें एक पहचान मिली है, जिससे मुझ जैसे बहुत सारे लोग, उत्तराखंडी होने पर गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे। तीसरी चीज जो मैं बहुत जरूरी मानता हूं और बहुत ही पक्के तौर पर …..।

हम रैबार जैसे कार्यक्रम से अपने लोगों को बुला रहे हैं आपका जहां से भी कनेक्ट बना हुआ है जैसे मेरा एचएएल, आईआईटी, आईआईसी से है, उसको मत छोड़ो। इससे यह होगा कि आप जो भी करना चाहेंगे वह नहीं कर पाएंगे। मैं दो छोटे-छोटे उदाहरण देना चाहता हूं कि कैसे चीजें हासिल की जा सकती हैं। सभी लोगों को पता होगा कि सीएसआर एक महत्वपूर्ण ऑस्पेक्ट उभरकर आया है जिसमें सरकार एक ‘चैलेंजिग एजेंसी फॉर डेवलपमेंट इन इंटायर कंट्री’ के रूप में काम कर रही है।

चाहे वह सैनीटेशन में हो, चाहे वह मेडिकल में हो चाहे वह किसी भी चीज में हो। कुल प्रॉफिट का 2 प्रतिशत सीएसआर फंड में दिया जाता है। हमारी कंपनी में यह 80 करोड़ का होता है। ओएनजीसी और एनटीपीसी में तो बहुत ज्यादा रकम आती है। एक प्रोजेक्ट था उसका खर्चा 10 करोड़ से सीधे 80 करोड़ चला गया था, तो हमारे लोग पूछने लगे कि इसको कैसे करना है तो मेरे दिमाग में एक ही चीज आया कि आपका अगर उद्देश्य सही है आप पूरी स्पष्टता के साथ मिशन मोड में काम करते हो तो खर्च कोई पार्ट होता ही नहीं है। तो एक छोटा सा प्रोजेक्ट आर्ट ऑफ लीविंग का था। श्रीश्री रवि शंकर का नाम आपने सुना ही होगा। वह मेरे पास आए और कहा कि  हम कुमदावती नदी का जीर्णोधार करना चाहते हैं जो कि बेंगलुरू के पानी की जरूरत को 33 प्रतिशत तक पूरा करती है। मैंने उनसे दो सवाल पूछे, क्या आपके पास प्रॉपर डाटा है।

उन्होंने कहा कि हम पांच साल से ढूंढ रहे हैं कि हमें कोई फंडिंग एजेंसी मिल जाए। मैंने कहा आपको मिलेगी, पहले आप मेरे तीन सवालों का जवाब दीजिए। मेरा पहला सवाल था कि आपके पास प्रॉपर डाटा है तो उन्होंने कहा कि हमने आईआरएससी से डाटा इकटठा किया, रेनफाल सौ साल से वही है। तो मैंने उनसे पूछा चेंज क्या आया, उन्होंने कहा कि आर्गेनाइजेशन पैटर्न में चेंज आया है कंकरीट के जंगल बन गए हैं मुझे उनका जो एक्सप्लेनेशन था बिल्कुल सही लगा। मैंने कहा, इसमें पानी बहेगा कि नहीं बहेगा, उन्होंने कहा इसमें पांच साल लगेंगे।

मैंने फिर उनसे पूछा खर्चा कितना आयेगा उन्होंने कहा 25 करोड़। मैंने उनको सीधा 12.5 करोड़ का कमिट किया। इतना लंबा इलाका पूरी तरह से बदल चुका है और इसके लिए हमको राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई एवार्ड भी मिल चुके हैं क्योंकि हमारा मिशन बिल्कुल साफ था इसमें हमें लोगों का सहयोग मिला। यह प्रोजेक्ट 2014 में शुरू किया था और 2019 में यह पूरा हो गया।

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